Chandra Shekhar Azad Poem in Hindi || चन्द्र शेखर आजाद पर कविता

चन्द्र शेखर आजाद पर कविताएं-




आजादी के नायक रहे चंद्रशेखर आजाद जी के जीवन पर कविताएं।

पहली कविता-


चंद्रशेखर नाम, सूरज का प्रखर उत्ताप हूँ मैं,


फूटते ज्वाला-मुखी-सा, क्रांति का उद्धोष हूँ मैं।


कोश जख्मो का, लगे इतिहास के जो वक्ष पर है,


चीखते प्रतिरोध का जलता हुआ आक्रोश हूँ मैं।।


 

विवश अधरों पर सुलगता गीत हूँ विद्रोह का मैं,


नाश के मन पर नशे जैसा चढ़ा उन्माद हूँ मैं।


मैं गुलामी का कफ़न, उजला सपन स्वाधीनता का,


नाम से आजाद, हर संकल्प फौलाद हूँ मैं।।


 

आंसुओं को, तेज मैं तेजाब का देने चला हूँ,


जो रही कल तक पराजय, आज उस पर जीत हूँ मैं।


मैं प्रभंजन हूँ, घुटन के बादलो को चीर देने,


बिजलियों की धडकनों का कड़कता संगीत हूँ मैं।।


 

सिसकियों पर, अब किसी अन्याय को पलने न दूंगा,


जुल्म के सिक्के किसी के, मैं यहाँ चलने न दूंगा।


खून के दीपक जलाकर अब दिवाली ही मानेगी,


इस धरा पर, अब दिलों की होलियाँ जलने न दूंगा।।


 

राज सत्ता में हुए मदहोश दीवानों! लुटेरों,


मैं तुम्हारे जुल्म के अघात को ललकारता हूँ।


मैं तुम्हारे दंभ को-पाखंड को, देता चुनौती,


मैं तुम्हारी जात को-औकात को ललकारता हूँ।।


 

मैं ज़माने को जगाने, आज यह आवाज देता


इंकलाबी आग में, अन्याय की होली जलाओ।


तुम नहीं कातर स्वरों में न्याय की अब भीख मांगो,


गर्जना के घोष में विद्रोह के अब गीत गाओ।।


 

आग भूखे पेट की, अधिकार देती है सभी को,


चूसते जो खून, उनकी बोटियाँ हम नोच खाएँ।


जिन भुजाओ के कसक-कुछ कर दिखाने की ठसक है,


वे न भूखे पेट, दिल की आग ही अपनी दिखाएँ।।


 

और मरना ही हमें जब, तड़प कर घुटकर मरें क्यों


छातियों में गोलियाँ खाकर शहादत से मरें हम।


मेमनों की भाँती मिमिया कर नहीं गर्दन कटाएँ,


स्वाभिमानी शीष ऊँचा रख, बगावत से मरें हम।।


 

इसलिए, मैं देश के हर आदमी से कह रहा हूँ,


आदमीयता का तकाजा है वतन के हो सिपाही।


हड्डियों में शक्ति वह पैदा करे, तलवार मुरझे,


तोप का मुंह बंद कर, हम जुल्म पर ढाएं तबाही।।


 

कलम के जादूगरों से कह रही युग-चेतना यह,


लेखनी की धार से, अंधेर का वे वक्ष फाड़ें।


रक्त, मज्जा, हड्डियों के मूल्य पर जो बन रहा हो,


तोड़ दे उसके कंगूरे, उस महल को वे उजाड़ें।।


 

बिक गई यदि कलम, तो फिर देश कैसे बच सकेगा,


सर कलम हो, कालम का सर शर्म से झुकने व पाए।


चल रही तलवार या बन्दूक हो जब देश के हित,


यह चले-चलती रहे, क्षण भर कलम रुकने न पाए।।


 

यह कलम ऐसे चले, श्रम-साधना की ज्यों कुदाली,


वर्ग-भेदों की शिलाएँ तोड़ चकनाचूर कर दे।


यह चले ऐसे कि चलते खेत में हल जिस तरह है,


उर्वरा अपनी धरा की, मोतियों से मांग भर दे।।


 

यह चले ऐसे कि उजड़े देश का सौभाग्य लिख दे,


यह चले ऐसे कि पतझड़ में बहारें मुस्कुराएँ।


यह चले ऐसे कि फसलें झूम कर गाएँ बघावे,


यह चले तो गर्व से खलिहान अपने सर उठाएँ।।


 

यह कलम ऐसे चले, ज्यों पुण्य की है बेल चलती,


यह कलम बन कर कटारी पाप के फाडे कलेजे।


यह कलम ऐसे चले, चलते प्रगति के पाँव जैसे,


यह कलम चल कर हमारे देश का गौरव सहेजे।।


 

सृष्टी नवयुग की करें हम, पुण्य-पावन इस धरा पर,


हाथ श्रम के, आज नूतन सर्जना करके दिखाएँ।


हो कला की साधना का श्रेय जन-कल्याणकारी,


हम सिपाही देश के दुर्भाग्य को जड़ से मिटाएँ।।


 

दूसरी कविता-


तुम आजाद थे, आजाद हो, आजाद रहोगे,


भारत की जवानियों के तुम खून में बहोगे।


 

मौत से आंखे मिलाकर वह बात करता था,


अंगदी व्यक्तित्व पर जमाना नाज करता था।


 

असहयोग आंदोलन का वो प्रणेता था,


भारत की स्वतंत्रता का वो चितेरा था।


 

बापू से था प्रभावित, पर रास्ता अलग था,


खौलता था खून अहिंसा से वो विलग था।


 

बचपन के पन्द्रह कोड़े, जो उसको पड़े थे,


आज उसके खून में वो शौर्य बन खड़े थे।


 

आजाद के टन पर कोड़े तडातड पड रहे थे,


'जय भारती' का उद्धोष चंद्रशेखर कर रहे थे।


 

हर एक घाव कोड़े का देता माँ भारती की दुहाई,


रक्तरंजित तन पर बलिदान की मेंहदी रचाई।


 

अहिंसा का पाठ उसको कभी न भाया,


खून के भीषण कहर से लिखी थी उसने कहानी।


 

उसकी फितरत में नहीं थी प्रार्थनाएं,


उसके शब्दकोशों में नहीं थी याचनाएं।


 

नहीं मंजूर था उसको गिडगिडाना,


और शत्रु के पैर के नीचे तडफडाना।


 

मंत्र बलिदान का उसने चुना था,


गर्व से मस्तक उसका ताना था।


 

क्रांति की ललकार को उसने आवाज दी थी,


स्वतंत्रता की आग को परवाज दी थी।


 

माँ भारती की लाज का वो पहरेदार था,


भारत की स्वतंत्रता का वो पैरोकार था।


 

अल्फ्रेड पार्क में लगी थी आजाद की मीटिंग,


किसी मुखबिर ने कर दी देश से चीटिंग।


 

नॉट बाबर ने घेरा और पूछा कौन हो तुम,


गोली से दिया जवाब तुम्हारे बाप है हम।


 

सभी साथियों को भगाकर रह गया अकेला,


उस तरफ लगा था बन्दूक लिए शत्रुओ का मेला।


 

सिर्फ एक गोली बची थी भाग किसने था मेटा,


आखिरी दम तक लड़ा वो माँ भारती का था बेटा।


 

रखी कनपटी पर पिस्तौल और दाग दी गोली,


माँ भारती के लाल ने खेल ली खुद खून की होली।


 

तुम आजाद थे, आजाद हो, आजाद रहोगे,


भारत की जवानियों के तुम खून में बहोगे।


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जयहिन्द

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